— वर्षा गोस्वामी
(स्तंभकार, लिबरल मीडिया एवं चेयरमैन, आरएमएल ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस)
राजनीति के आधुनिक रंगमंच पर समय-समय पर ऐसे प्रयोग होते रहे हैं, जो अपने अतरंगी नाम, अनोखी शैली और सोशल मीडिया के दौर में रातों-रात बटोरी गई सुर्खियों के कारण कौतूहल का विषय बन जाते हैं। हाल के दिनों में चर्चा में आया ‘काक्रोच पार्टी’ जैसा प्रयोग भी इसी प्रवृत्ति का उदाहरण प्रतीत होता है। लेकिन लोकतांत्रिक राजनीति का पुराना सत्य यही है कि जो गुब्बारा केवल हवा के भरोसे फूलता है, उसकी हवा निकलने में भी देर नहीं लगती। दावों और वादों की जमीन पर वास्तविक पैर रखने से पहले ही, महज एक सप्ताह के भीतर यह राजनीतिक कौतूहल फीका पड़ गया।
यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जिस प्रयोग को लेकर सोशल मीडिया और कुछ खास हलकों में इतना शोर था, वह सात दिन भी अपनी चमक क्यों नहीं बचा सका? दरअसल इसके पीछे कुछ बुनियादी राजनीतिक और सामाजिक कारण हैं, जिन्हें नजरअंदाज करके कोई भी आंदोलन या संगठन लंबा सफर तय नहीं कर सकता। यह केवल किसी एक समूह की विफलता नहीं, बल्कि समकालीन राजनीति में गहराते वैचारिक संकट का प्रतीक भी है।
वैचारिक आधार के बिना राजनीति अधूरी
किसी भी राजनीतिक दल या सामाजिक आंदोलन की असली ताकत उसके सिद्धांत, दूरगामी दृष्टि और जनता से जुड़े ठोस मुद्दों में होती है। यदि किसी अभियान का आधार केवल एक विवादित या चौंकाने वाला नाम रखकर लोगों का ध्यान आकर्षित करना हो, तो उसकी उम्र सीमित ही रहती है।
जनता शुरुआती दौर में ऐसे प्रयोगों को उत्सुकतावश देख सकती है, लेकिन जब बात देश, समाज और व्यवस्था संचालन की आती है, तो वह नेतृत्व में गंभीरता और परिपक्वता तलाशती है। केवल ‘अटेंशन इकॉनमी’ के सहारे राजनीति नहीं चलती। लोकतंत्र में स्थायित्व पाने के लिए वैचारिक स्पष्टता और जनविश्वास आवश्यक होता है।
सोशल मीडिया की चमक और जमीनी सच्चाई
डिजिटल युग ने राजनीति की भाषा बदल दी है। आज ट्रेंड, लाइक्स और वायरल वीडियो को कई लोग जनसमर्थन का पर्याय मानने लगे हैं। जबकि हकीकत यह है कि इंटरनेट की दुनिया में किसी भी विषय का रातों-रात लोकप्रिय होना और अगले ही सप्ताह भुला दिया जाना बेहद सामान्य बात है।
यही स्थिति इस तथाकथित राजनीतिक प्रयोग के साथ भी देखने को मिली। जब तक उसका शोर सोशल मीडिया से निकलकर जमीन तक पहुंचता, तब तक लोगों का ध्यान किसी नए ट्रेंड की ओर मुड़ चुका था। राजनीति केवल ऑनलाइन उपस्थिति का खेल नहीं है। इसके लिए बूथ स्तर तक संगठन, समर्पित कार्यकर्ता, निरंतर जनसंवाद और संघर्ष की आवश्यकता होती है। बिना मजबूत जमीनी ढांचे के कोई भी आंदोलन टिकाऊ नहीं बन सकता।
जागरूक मतदाता और विश्वसनीयता का सवाल
भारतीय मतदाता पहले की अपेक्षा कहीं अधिक जागरूक और राजनीतिक रूप से परिपक्व हो चुका है। अब केवल नारेबाजी, तात्कालिक गुस्से या सोशल मीडिया प्रचार से जनता को लंबे समय तक प्रभावित नहीं किया जा सकता। लोग नेतृत्व की गंभीरता, उसके सामाजिक कार्यों और उसकी मंशा को परखते हैं।
जब किसी संगठन के पीछे कोई विश्वसनीय चेहरा, सामाजिक संघर्ष का इतिहास या स्पष्ट नीतिगत रोडमैप नजर नहीं आता, तो समाज उसे महज एक पब्लिसिटी स्टंट के रूप में देखता है। लोकतंत्र में विश्वसनीयता अर्जित करने में वर्षों लगते हैं, लेकिन उसे खोने में कुछ ही क्षण पर्याप्त होते हैं।
युवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश
एक शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में इस पूरे घटनाक्रम में युवाओं के लिए भी एक बड़ा संदेश छिपा है। चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो, संस्थान निर्माण हो या राजनीति—शॉर्टकट और तात्कालिक सनसनी कभी स्थायी परिणाम नहीं दे सकते।
जिस प्रकार एक मजबूत शैक्षणिक संस्थान वर्षों की मेहनत, अनुशासन और सिद्धांतों पर खड़ा होता है, उसी प्रकार सार्वजनिक जीवन और राजनीति भी दीर्घकालिक समर्पण मांगते हैं। राजनीति कोई “वन-वीक वंडर” नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने और उसकी समस्याओं के समाधान के लिए निरंतर संघर्ष का माध्यम है।
आज आवश्यकता सनसनी फैलाने की नहीं, बल्कि सकारात्मक सोच, दूरदृष्टि और जिम्मेदार नेतृत्व की है। लोकतंत्र में बदलाव केवल नारों और ट्रेंड्स से नहीं आता; उसके लिए जमीनी जुड़ाव, वैचारिक प्रतिबद्धता और जनता के प्रति जवाबदेही जरूरी होती है। हालिया राजनीतिक प्रयोग का अल्प समय में नेपथ्य में चले जाना इसी सच्चाई की पुनर्पुष्टि करता है कि गंभीर लोकतंत्र में सतही हवा के सहारे लंबी उड़ान संभव नहीं होती।
© Liberal Media








