लेखक: अभिनय ‘विचारक’
पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 के चुनावी परिणाम केवल एक दल की हार और दूसरे की जीत मात्र नहीं हैं—यह भारतीय राजनीति के इतिहास में एक कालजयी अध्याय है। इसे केवल सत्ता परिवर्तन कहना लोकतंत्र के उस मौन शोर को कमतर आंकना होगा, जिसने दीदी के अभेद्य माने जाने वाले दुर्ग की ईंट से ईंट बजा दी। वर्षों तक अपराजेय मानी जाने वाली ममता बनर्जी की सत्ता जिस तरह ढही, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि लोकतंत्र में ‘अहंकार’ और ‘जनता’ के बीच जब भी संघर्ष होगा, अंततः जनादेश ही सर्वोपरि होगा।
इस पराजय के पीछे केवल सतही जनाक्रोश नहीं था, बल्कि एक ऐसी रणनीतिक बिसात थी जिसने विरोधी के हर ‘खेला’ को बेअसर कर दिया। भाजपा के रणनीतिकार सुनील बंसल ने बंगाल की उस उर्वर जमीन पर संगठन का जो ढांचा खड़ा किया, उसे लंबे समय तक राजनीतिक पंडित असंभव मान रहे थे। बंसल की कार्यशैली की सबसे बड़ी ताकत उनकी ‘खामोशी’ रही। उन्होंने चुनाव को केवल बड़े मंचों और भाषणों तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे बंगाल की उन संकरी गलियों और सुदूर गांवों के ‘आंगन’ तक उतार दिया जहाँ कभी प्रवेश करना भी चुनौती थी।
बूथ स्तर पर एक-एक कार्यकर्ता की जवाबदेही तय करना और सत्ता के दमनकारी तंत्र के सामने संगठन को एक सुरक्षा कवच देना—यही वह ‘साइलेंट वार’ था, जिसने अंततः तृणमूल के संगठित तंत्र को ध्वस्त कर दिया। जब सत्ता के मद में चूर तंत्र जनता की नब्ज़ पढ़ने में विफल हो जाता है, तो वह केवल आंकड़ों में जीता है, हकीकत में नहीं। कानून-व्यवस्था पर उठते गंभीर सवाल, भ्रष्टाचार के संस्थागत आरोप और राजनीतिक हिंसा के प्रति पनपा आक्रोश—इन सबने मिलकर बंगाल की मिट्टी में एक विस्फोटक नाराजगी भर दी थी। जब यह आक्रोश मतपेटियों के जरिए बाहर निकला, तो उसने बड़े-बड़े सियासी दिग्गजों को हाशिए पर धकेल दिया।
अमित शाह की रणनीतिक छाया में काम करते हुए सुनील बंसल ने यह साबित किया कि चुनावी युद्ध केवल नारों से नहीं, बल्कि कठोर अनुशासन और माइक्रो-मैनेजमेंट से जीते जाते हैं। उन्होंने ‘बाहरी’ होने के नैरेटिव को ‘स्थानीय अस्मिता’ और ‘विकास’ की भूख से काटकर रख दिया।
बंगाल का यह जनादेश पूरे देश की राजनीति के लिए एक सख्त चेतावनी और सबक है। यह संदेश साफ है—जनता सब देख रही है और जब जवाब देने की बारी आती है, तो वह किसी भी बड़े नाम या चेहरे का मोह नहीं करती। जो सरकारें जनता के मुद्दों से कटकर खुद को व्यवस्था का पर्याय मान बैठती हैं, उनका पतन इसी तरह ऐतिहासिक होता है। बंगाल में आज जो ‘भगवा उदय’ हुआ है, वह रणनीति की शुचिता और संगठनात्मक दृढ़ता की एक निर्णायक जीत है।








