●अभिनय गुप्ता (सीईओ-लिबरल मीडिया)
शाहजहांपुर। जिले में प्रतिबंधित चाइनीज मांझे का कारोबार अब एक संगठित अपराध का रूप ले चुका है। प्रशासन की सख्ती से बचने के लिए दुकानदारों ने खेल बदल दिया है। मांझा अब काउंटर पर नहीं, बल्कि गुप्त गोदामों और घरों में छिपाकर बेचा जा रहा है। सबसे बड़ा सवाल उन खरीदारों पर है, जो चंद रुपयों के लालच में दूसरों की गर्दन पर वार करने वाला यह ‘मौत का धागा’ खरीद रहे हैं।
चोरी-छिपे स्टॉक का खेल सूत्रों के अनुसार, शहर के मुख्य बाजारों में दुकानदारों ने मांझे का स्टॉक दुकानों में रखने के बजाय अलग-अलग रिहायशी इलाकों और निजी स्थानों पर शिफ्ट कर दिया है। ग्राहक के मांगते ही इसे ‘होम डिलीवरी’ या किसी तय स्थान पर बुलाया जाता है। प्रशासन के पास इन ठिकानों की कोई ठोस जानकारी न होना तंत्र की विफलता को दर्शाता है।
उपयोग करने वाले भी बराबर के गुनहगार रिपोर्ट के अनुसार, इस खूनी खेल में केवल दुकानदार ही नहीं, बल्कि इसे खरीदने वाले शौकीन भी उतने ही जिम्मेदार हैं। जब तक लोग खुद जागरूक होकर इसे खरीदना बंद नहीं करेंगे, तब तक यह मौत का व्यापार चलता रहेगा। एक सिपाही की जान लेने वाले इस मांझे का मोह पालना किसी जघन्य अपराध से कम नहीं है।
बसंत पंचमी पर ‘डेथ ट्रैप’ आगामी त्यौहार को लेकर राहगीरों में डर का माहौल है। बाइक सवारों के लिए यह मांझा ‘डेथ ट्रैप’ साबित होता है। पुलिस को चाहिए कि वह केवल औपचारिकता न निभाए, बल्कि संदिग्ध ठिकानों पर छापेमारी कर इस अवैध नेटवर्क को ध्वस्त करे।
◆ लिबरल मीडिया प्रशासन से पूछता है कि आखिर कानून का खौफ ज़मीन पर क्यों नहीं उतर रहा?
● खुफिया तंत्र फेल क्यों? जब शहर की गलियों और गुप्त ठिकानों पर मांझा स्टॉक किया जा रहा है, तो स्थानीय पुलिस और खुफिया विभाग को इसकी भनक क्यों नहीं लग रही?
●सिर्फ दुकानों पर ही नज़र क्यों?
दुकानदार अब सामान घरों और गोदामों में छिपा रहे हैं, क्या प्रशासन इन ‘अवैध सेफ हाउस’ पर छापेमारी की योजना बनाएगा?
● सिपाही की शहादत का क्या? विभाग का अपना साथी जान गंवा चुका है, फिर भी पुलिस इस खूनी कारोबार के प्रति इतनी नरम क्यों है?
● क्रेता पर कार्रवाई कब?
क्या प्रशासन उन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करेगा जो खुलेआम सड़कों पर इस जानलेवा धागे का इस्तेमाल कर दूसरों की जान जोखिम में डाल रहे हैं?
✍️अभिनय गुप्ता
“चाइनीज मांझा बेचना व्यापार नहीं, हत्या का प्रयास है। और इसे खरीदना उस अपराध में शामिल होना है। अब वक्त है कि प्रशासन कागजी खानापूर्ति छोड़कर ‘जीरो टॉलरेंस’ का उदाहरण पेश करे।”









जब तक कोई कठोर कदम प्रशासन नहीं उठाएगा, इसे एक जघन्य अपराध नहीं मानेगा, ये खेल चलता रहेगा और दुर्घटनाएं होती रहेंगी।