Rudrapur | Liberal Media
उत्तराखंड आज एक गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। प्रदेश में हत्या, बलात्कार, चोरी, नशे का बढ़ता कारोबार, अवैध खनन और संगठित अपराध लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन सरकार की चुप्पी जनता के आक्रोश को और गहरा कर रही है। गांव से शहर तक असुरक्षा का माहौल है, महिलाएं खुद को सुरक्षित नहीं मान रहीं, युवा नशे की गिरफ्त में फंसते जा रहे हैं और अपराधी बेखौफ नजर आ रहे हैं।
इसके बावजूद सरकार कानून व्यवस्था को “नियंत्रण में” बताकर संतोष जता रही है। जनता सवाल कर रही है कि अगर हालात सामान्य हैं, तो भय का यह माहौल क्यों है?
बग्गा-54, बिंदुखत्ता और ऋषिकेश जैसे इलाकों में दशकों से बसे गरीब और भूमिहीन परिवारों को अतिक्रमण के नाम पर उजाड़ा जा रहा है, जबकि अवैध खनन माफिया खुलेआम पहाड़ों और नदियों का दोहन कर रहे हैं। लोगों का आरोप है कि कानून गरीबों पर सख्त और माफियाओं पर नरम नजर आ रहा है।
प्रदेश को झकझोर देने वाले अंकिता भंडारी हत्याकांड में अब तक न्याय न मिलना भी जनता के विश्वास को तोड़ रहा है। CBI जांच और उच्च न्यायालय की निगरानी से सरकार की हिचक पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
नशे का अवैध कारोबार युवाओं को बर्बादी की ओर धकेल रहा है और अवैध खनन राज्य के भविष्य को खोखला कर रहा है। जनता पूछ रही है कि आखिर इन माफियाओं को संरक्षण कौन दे रहा है।
इन हालातों में विशेष विधानसभा सत्र बुलाने से सरकार का बचना भी सवालों के घेरे में है। जनता अब आश्वासन नहीं, ठोस कार्रवाई चाहती है-अपराध पर जीरो टॉलरेंस, अंकिता मामले में स्वतंत्र जांच, भूमिहीनों के लिए स्थायी नीति और नशा व खनन माफिया पर निर्णायक वार।
प्रदेश में यह भावना तेजी से मजबूत हो रही है कि यह अब जनता बनाम सरकार की लड़ाई बन चुकी है।
उत्तराखंड पूछ रहा है-सत्ता जनता के साथ है या अपराध के?
उत्तराखंड में अपराध बेलगाम, न्याय गायब – सत्ता आखिर किसके साथ खड़ी है?रिपोर्टर : राजीव चावला
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