लोकतंत्र के चार स्तंभों में पत्रकारिता को वह स्थान प्राप्त है, जहाँ से सत्ता, समाज और व्यवस्था-तीनों पर निगाह रखी जाती है। पत्रकारिता केवल समाचारों का संकलन या प्रसारण भर नहीं है, बल्कि यह सच की खोज, जनहित की रक्षा और सामाजिक चेतना को जीवित रखने का दायित्व है। लेकिन आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या हम उस पत्रकारिता को बचा पा रहे हैं, जिसके मापदंडों ने कभी इस पेशे को सम्मान और विश्वसनीयता दी थी?
पिछले कुछ वर्षों में पत्रकारिता के स्वरूप में तेज़ी से बदलाव आया है। तकनीक ने सूचना को तेज़ और सुलभ बनाया, लेकिन इसके साथ ही सनसनी, जल्दबाज़ी और टीआरपी की अंधी दौड़ ने पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों को हाशिए पर धकेल दिया। तथ्य, संतुलन और निष्पक्षता जैसे मूल्य धीरे-धीरे कमजोर होते जा रहे हैं। कई बार खबर से अधिक महत्वपूर्ण ‘ब्रेकिंग’ बन जाती है और सत्य से पहले ‘वायरल’ होने की चिंता दिखाई देती है।
पत्रकारिता के मापदंड-सत्यता, निष्पक्षता, जनहित, जिम्मेदारी और संवेदनशीलता- किसी भी सभ्य समाज की बुनियाद होते हैं। यदि इन मापदंडों से समझौता किया गया, तो पत्रकारिता केवल शोर बनकर रह जाएगी, जो दिशा नहीं देती, बल्कि भ्रम पैदा करती है। आज जरूरत इस बात की है कि खबर की पुष्टि, दोनों पक्षों की बात और सामाजिक प्रभाव को समझे बिना किसी निष्कर्ष पर न पहुँचा जाए।
दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि आर्थिक दबाव, राजनीतिक प्रभाव और कॉर्पोरेट हित पत्रकारिता को प्रभावित करने लगे हैं। कई बार विज्ञापन और लाभ पत्रकारिता की आत्मा पर भारी पड़ते नजर आते हैं। ऐसे में पत्रकार का दायित्व और भी बढ़ जाता है कि वह सत्ता या पूंजी के नहीं, बल्कि जनता के पक्ष में खड़ा रहे।
सोशल मीडिया के दौर में अफवाहें और आधी-अधूरी सूचनाएँ तेजी से फैलती हैं। यहाँ पर जिम्मेदार पत्रकारिता की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। पत्रकार का काम केवल सूचना देना नहीं, बल्कि सूचना को परखकर, समझाकर और समाज के सामने सही संदर्भ में रखना है।
आवश्यकता इस बात की है कि पत्रकारिता के प्रशिक्षण, संपादकीय अनुशासन और आचार संहिता को फिर से मजबूती दी जाए। मीडिया संस्थानों को चाहिए कि वे अपने संवाददाताओं को टीआरपी या क्लिक के दबाव से ऊपर उठकर काम करने का अवसर दें। वहीं पत्रकारों को भी आत्ममंथन करना होगा कि वे किस उद्देश्य से इस पेशे में आए थे।
पत्रकारिता तभी जीवित रह सकती है, जब उसके मापदंड सुरक्षित रहेंगे। यदि मापदंड बचे, तो पत्रकारिता बचेगी; और यदि पत्रकारिता बचेगी, तो लोकतंत्र मजबूत होगा। आज यह जिम्मेदारी हम सभी की है-पत्रकार, संपादक, संस्थान और पाठक- हम सब मिलकर पत्रकारिता की गरिमा, उसकी विश्वसनीयता और उसके मूल्यों को बचाएँ। यही समय की सबसे बड़ी मांग है।













