कॉर्पोरेट के चंगुल में फंसा ‘प्रेम’, 14 फरवरी को आत्ममंथन करता एक विशेष लेख: अभिनय “विचारक”

By Liberal Media

Updated On:

Valentine Day History vs Consumerism Opinion Piece

(Liberal Media): भारत में वेलेंटाइन डे की पहचान पिछले दो-ढाई दशकों में तेजी से बदली है। आर्थिक उदारीकरण से लेकर इंटरनेट की क्रांति ने इस दिन को हमारे समाज का हिस्सा बना दिया। लेकिन क्या हम उस मूल भावना को याद रखते हैं जिसने इस दिन को जन्म दिया? लेखक अभिनय “विचारक” इस लेख के माध्यम से वेलेंटाइन डे की ‘शहादत से बाजार’ तक की यात्रा का विश्लेषण कर रहे हैं।

इतिहास की शहादत और आधुनिक बाजार

इतिहास गवाह है कि यह दिन तीसरी सदी के ईसाई संत Saint Valentine की स्मृति में मनाया जाता है, जिन्होंने प्रेम और विवाह की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। किंतु आज यह दिन मॉल की सजावट, ऑनलाइन सेल और महंगे गिफ्ट्स का पर्याय बन चुका है। कॉर्पोरेट कंपनियों ने मानवीय भावनाओं को एक ‘प्रोडक्ट’ में बदल दिया है।

प्रेम: उपहार या समर्पण?

लेखक के अनुसार, प्रेम का सार महंगे उपहारों में नहीं, बल्कि सम्मान, विश्वास और समर्पण में निहित है। यदि 14 फरवरी इन मूल्यों को मजबूत करती है, तो इसका स्वागत है, लेकिन यदि यह केवल उपभोक्तावाद का जरिया है, तो आत्ममंथन की आवश्यकता है।

“मंच सजा है बाज़ार का, महँगे बिकते उपहार, पर अभिनय ढूँढ रहा है, रूहों का सत्कार। संत की उस शहादत को, जब सेल में बदला देखा, तब कागज़ पर उतर आई, शब्दों की अमिट रेखा।”

वेलेंटाइन डे विदेशी है या स्वदेशी, यह बहस उतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितनी यह कि हम उसे किस नजरिए से देखते हैं। शहादत की स्मृति से जन्मा यह दिन यदि बाजार की भीड़ में खो रहा है, तो उसे पुनः अर्थपूर्ण बनाना हमारे ही हाथ में है।

Leave a Comment

Verified by MonsterInsights