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महराजगंज (नौतनवा)।
देश 21वीं सदी में डिजिटल इंडिया, चंद्रयान और बुलेट ट्रेन की बातें कर रहा है, लेकिन महराजगंज जनपद के नौतनवा तहसील अंतर्गत सेमरहवा गांव आज भी विकास से कोसों दूर है। आजादी के 78 साल बाद भी इस गांव को पक्का पुल नहीं मिल सका, जिसके चलते करीब 6000 की आबादी रोज़मर्रा की ज़िंदगी के लिए नदी पार कर जान जोखिम में डालने को मजबूर है।
बरसात के मौसम में नदी का जलस्तर बढ़ते ही गांव का संपर्क पूरी तरह कट जाता है। ऐसे में ग्रामीणों का एकमात्र सहारा नाव बनती है। छोटे बच्चे इसी नाव से स्कूल जाते हैं, बीमार मरीज अस्पताल पहुंचाए जाते हैं और गर्भवती महिलाओं को प्रसव पीड़ा में नदी पार करनी पड़ती है। थोड़ी सी चूक जानलेवा साबित हो सकती है, लेकिन विकल्प न होने के कारण ग्रामीण खतरे के बीच सफर करने को मजबूर हैं।
जब पानी कुछ कम होता है, तब ग्रामीण अस्थायी बाँस के पुल का इस्तेमाल करते हैं। यह पुल हर समय हादसे का खतरा बना रहता है। तेज हवा या बारिश में यह और भी खतरनाक हो जाता है, लेकिन मजबूरी ग्रामीणों को इसी रास्ते से गुजरने पर विवश करती है।
एम्बुलेंस नहीं, नाव ही आखिरी सहारा
गांव तक न पक्की सड़क है और न ही पुल, जिससे एम्बुलेंस पहुंच ही नहीं पाती। आपात स्थिति में मरीजों को चारपाई या स्ट्रेचर पर लादकर नदी पार कराई जाती है। कई बार रास्ते में हालत बिगड़ जाती है, तो कई मामलों में नाव में ही बच्चों का जन्म हो जाता है। समय पर इलाज न मिलने से जच्चा-बच्चा दोनों की जान पर बन आती है।
दुल्हन की विदाई भी बनी संघर्ष
सेमरहवा में शादी-विवाह भी किसी जंग से कम नहीं। जहां शहरों में दुल्हन की विदाई गाड़ियों से होती है, वहीं यहां नई-नवेली दुल्हन को नाव या बाँस के पुल से ससुराल ले जाना पड़ता है। यह दृश्य विकास के दावों पर करारा तमाचा है।
पुल नहीं तो रिश्ते भी नहीं
करीब 6000 की आबादी वाला यह गांव आज सिर्फ भौगोलिक नहीं, बल्कि सामाजिक बहिष्कार भी झेल रहा है। ग्रामीणों के अनुसार, पुल न होने की वजह से बाहर के लोग यहां रिश्ते करने से कतराते हैं। नदी पार करने की मजबूरी सामने आते ही रिश्ते टूट जाते हैं। नतीजतन कई युवक विवाह की उम्र पार कर चुके हैं।
जंगल और नदी के बीच कैद गांव
तीन तरफ घना जंगल और एक तरफ बहती नदी ने सेमरहवा को जैसे समय में पीछे धकेल दिया है। पक्की सड़क और पुल के अभाव में चार पहिया वाहन गांव तक नहीं पहुंच पाते। आज भी अनाज, सब्ज़ी और घरेलू सामान बैलगाड़ियों से ढोए जाते हैं। यह परंपरा नहीं, मजबूरी है।
ग्रामीणों का कहना है कि पुल निर्माण को लेकर कई बार जनप्रतिनिधियों और प्रशासन से गुहार लगाई गई, लेकिन अब तक सिर्फ आश्वासन ही मिले हैं।
सेमरहवा के लोग आज भी इंतजार कर रहे हैं-उस दिन का, जब वे नदी नहीं, सिस्टम की बेरुखी से आज़ाद होंगे।
78 साल बाद भी सेमरहवा को पुल नसीब नहीं, 6000 ग्रामीण नदी पार कर जीने को मजबूर
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